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कृषि उत्पादन में लागत कम करने की तकनीक | Techniques to reduce costs in agricultural production |

कृषि उत्पादन में लागत कम करने की तकनीककृषि उत्पादन में लागत कम करने की तकनीक:

किसान भाइयों जैसा कि किसी क्षेत्र में विकास दर की वृद्धि के लिए उपलब्ध संसाधनों का न केवल अनुकूलतम उपयोग कृषि उत्पादन लागत में कमी के उपायों पर भी बल दिया जाना आवश्यक हो गया है उत्पादन लागत को कम करने में कमियां अथवा बगैर अतिरिक्त लागत में तकनीकों का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। इस HindiaPediaa (हिंदीपीडिया) लेख में, आप कृषि खेती के लिए कृषि उत्पादन में लागत कम करने की सभी तकनीकों के बारे में जान सकते हैं।।

अधिक उत्पादन हेतु अपनाएं आधुनिक कृषि तकनिकी:

अधिक उत्पादन हेतु कृषक भाइयों को याद यह तकनीकी से फसल का उत्पादन गुणवत्ता एवं मृदा की स्वास्थ्य बनाया जा सकता है हम अपने खेतों में इस तकनीक का उपयोग करके पूरे वर्ष अच्छी खेती करके उत्पादन किया जा सकता है।

  • कृषक को गर्मी में गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से आवश्यक करने चाहिए।
  • कृषक को वर्षा जल के संरक्षण एवं भूषण को रोकने हेतु खेत की मेड़ मजबूत एवं ऊंची रखे हैं तथा पहली एवं लंबे अंतराल पर हुए वर्षा में जल के साथ वायुमंडलीय नाइट्रोजन ओला होने के कारण भूमि की उर्वरा क्षमता वृद्ध होती है जिससे इससे किसान भाइयों को अधिक लाभ प्राप्त होता है।
  • फसल चक्र में दलहनी फसल का उपयोग अवश्य करनी चाहिए जिससे फसल की उत्पादन में वृद्धि और भूमि की उर्वरा शक्ति बरकरार रहती है।
  • मृदा परीक्षण के आधार पर खाद और उर्वरक खेतों में उपयोग करनी चाहिए जिससे फसल की सही मात्रा में उर्वरक मिल सके और उत्पादन में वृद्धि हो सके।
  • मृदा स्वास्थ्य के सुधार हेतु कार्बनिक खाद जैसे कंपोस्ट वर्मी, कंपोस्ट, नापेड कंपोस्ट  आदि का प्रयोग किसान भाई को करनी चाहिए।
  • धान-गेहूं फसल चक्र वाले क्षेत्रों में मृदा उर्वरता को बनाए रखने के लिए हरी खाद जैसे- ढांचा, सनई, मूंग और उड़द आदि हरी खाद का उपयोग करना चाहिए।
  • किसान भाई यदि संभव हो तो आधारीय, प्रमाणित बीज का प्रयोग करनी चाहिए।
  • किसान भाई यदि घर के बीज का प्रयोग बुवाई हेतु किया जा रहा है तो बीज का उपचार फफूदानाशक, रसायन या बायोपेस्टिसाइड से अवश्य कर लेनी चाहिए।
  • अधिक उत्पादन हेतु पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी पर विधि का उपयोग करनी चाहिए।
  • किसान भाई अधिक उत्पादन एवं गुणवत्ता युक्त उत्पादन प्राप्त करने हेतु उर्वरक बायो-पेस्टिसाइड जैविक खाद का प्रयोग करनी चाहिए।
  • किसान भाइयों को खेत में धान का पुआल, गेहूं का डंठल आदि को ना जलाएं बल्कि डिस्क हैरो या मिट्टी पलटने वाले हल से खेत में पलट कर सड़ा देनी चाहिए।किसान भाई फसल को खेत में जलाने से खेत की उर्वरा शक्ति खत्म हो जाती है जिससे उत्पादन में कमी आती है और पर्यावरण भी दूषित होता है जिसके कारण से प्रदूषण फैलता है।
  • फसलों की सिंचाई पारंपारिक विधि से ना करके बल्कि सिंचाई की उन्नत विधियों जैसे क्यारी थाला, बॉर्डर, चिक बेसिन, स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई विधि आदि का प्रयोग करनी चाहिए इससे जल की बचत और फसल उत्पादन वृद्धि होती है।
  • अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने हेतु एकीकृत पौधे पोषण प्रबंधन (IPNM) एवं एकीकृत नासी जीव प्रबंधन (IPM) तकनीक को अपनाना चाहिए।
  • फसलों में उचित समय पर खरपतवार को नियंत्रण करनी चाहिए।
  • कम अवधि की नगदी फसल जैसे आलू, कद्दू, मशरूम आदि फसलों की खेती प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए।
  • किसान भाइयों अधिक आमदनी प्राप्त करने हेतु फसल के साथ-साथ पशुपालन, बागवानी, सब्जी उत्पादन, फूल उत्पादन, मत्स्य पालन, कुक्कुट पालन और मधुमक्खी पालन आदि का उपयोग करना चाहिए।

कृषि उत्पादन में लागत कम करने की तकनीक के प्रकार:

फसल व प्रजातियों का चुनाव:

क्षेत्रीय विविधता के अनुरूप फसलों एवं उपयुक्त प्रजातियों के उपयोग से बगैर किसी अतिरिक्त लागत के उत्पादन स्तर में वृद्ध लाई जा सकती है।

  1. सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में धान गेहूं जैसी फसलों के स्थान पर कम सिंचाई मांग वाली फसलें जैसे ज्वार, बाजरा, अरहर, अलसी, मसूर, सरसों जैसे फसलें बोई जानी चाहिए।
  2. विलंब से बोवाई की जाने की दशा में फसलों की उचित प्रजातियां तथा उन्नति प्रजातियों का चयन करें।

समय से बोवाई / रोपाई:

  1. भारतवर्ष में सर्वाधिक अधिक क्षेत्रफल धानगेहूं फसल चक्र के अंतर्गत है परंतु यह दोनों ही फसलें नियत समय से बोवाई की जाने के कारण अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन देने में समर्थ नहीं होती है प्रचलित प्रजातियों को दृष्टिगत रखते हुए धान की रोपाई जुलाई के पक्ष में एवं गेहूं की बुवाई नवंबर की पक्ष में पूर्ण कर ली जाए तो उत्पादन बगैर किसी अतिरिक्त लागत बढ़ जाएगा। यहां ध्यान रखना आवश्यक है कि विलंब की संभावना को देखते हुए तदनुसार उपयुक्त प्रजातियों को अपनाया जाना आवश्यक है। 

बीज शोधन:

  1. फसलों की वृद्धि एवं विकास के दौरान रोग एवं कीट के प्रभाव से सर्वाधिक फसलों की क्षति होती है प्राय: रोग या कीट का प्रकोप समय से प्रारंभिक अवस्था मे ज्ञात न होने से अत्यधिक क्षति का सामना खूब करना पड़ता है। धान, गेहूं, गन्ना, आलू, दलहनी एवं तिलहनी फसलों को भी शोधन के माध्यम से संभावित रोग या कीटों से मुक्त किया जा सकता है। 
  2. वर्तमान में जैव उर्वरकों बीज या ट्राइकोडरमा के प्रयोग से कम लागत में फसल बीज के जमाव में वृद्धि के साथ-साथ, रोगों से संरक्षित भी रखा जा सकता है। जैव उर्वरकों जैसे- एजोटोबेक्टर राइजोबियम, पीएसबी आदि से लगातार फसलों के पोषक तत्वों की कमी को पूरा किया जा सकता है, जैसे कि शोध परिणामों में पाया गया कि सरसों के बीज को एजोस्पिरिलम उपचारित करने पर अधिक उत्पादन होता है जबकि इस लागत कम आती है।

उर्वरक जैव उर्वरकों:

  1. किसान भाई यह जरूर ध्यान दे कि हमारे खेतों में फास्फोरस की काफी मात्रा है क्योंकि हम जो जो फास्फेटिक खेतों में डालते हैं, पहली बार में उसका 25% ही फसलों को मिलता है शेष मिट्टी में भंडारित या मिल जाता है जिससे फसलों को लाभ नहीं हो पाता हैं,  इससे फसलों को प्राप्त कराने हेतु पीएसबी जैव उर्वरक का प्रयोग करें जो मिट्टी में फास्फोरस को घुलनशील  अवस्था में लाकर फसलों का उपलब्ध कराता है।
  2. पीएसबी जैव उर्वरक एक पैकेट से 10 किलोग्राम बीज को उपचारित कर बुवाई करें, 10 पैकेट पीएसबी एक बोरी डीएपी के बराबर होता है।
  3. देसी केंचुए की खाद जिसे हम वर्मी कंपोस्ट खाद्य एवं पीएसबी जैव उर्वरक के इस्तेमाल से फास्फोरस की जरूरत में भी 20% तक कमी की जा सकती है इसके प्रयोग से गेहूं या अन्य धान्य फसलों में फास्फोरस की मात्रा में 20% तक की कमी की जा सकती है। 
  4. डीएपी के स्थान पर फास्फोरस के अन्य स्त्रोत जैसे सिंगल सुपर फास्फेट,  एनपीके उर्वरकों का इस्तेमाल किसान भाई कर सकते हैं। 
  5. बुवाई के समय फास्फेटिक उर्वरक के पूर्व में प्रयोग करें इससे फास्फोरस उपलब्ध क्षमता 15 से 20 बढ़ाई जा सकती है।
  6. मिट्टी क्षारीय मिट्टी का जिप्सम में सुधार करने पर मिट्टी में फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ जाएगी।

सहफसली खेती:

कृषि योग्य क्षेत्र का जोत का आकार जनसंख्या के कारण कम हो रही है जिससे फसल का उत्पादन कम कम होती जा रही है किसान भाइयों ऐसी स्थिति में हम किसानों को सहफसली खेती का उपयोग करना चाहिए,  प्राकृतिक कारणों रोग की प्रतिकूल मौसम में प्रकोप से संभावित हानि के स्तर को भी कम किया जा सकता है।

  1. सहफसली पद्धति में दोनों फसलों की जाति एवं प्राकृतिक रूप से भिन्न रखी जाती है इसके पोषक तत्वों की आपूर्ति सिंचाई जल की आवश्यकता व अन्य देखरेख में संतुलन बनाए रखता है। जैसे गेहूं+सरसों (9.1 के पंक्ति अनुपात में बुवाई), आलू + राई (3.1 के के पंक्ति अनुपात में बुवाई) , गन्ना + राई (1.2 के पंक्ति अनुपात में बुवाई ), गन्ना+मसूर (13 के पंक्ति अनुपात में बुवाई)

उपयुक्त तकनीक में कृषि यंत्रों का उपयोग: 

किसान भाइयों कृषि कार्य में श्रम की लागत पर प्रायः ध्यान नहीं दिया जाता है पारंपारिक पशु / मानव श्रम से किए जाने वाले कार्यों का कम लागत पर अपेक्षाकृत काफी कम समय में उच्च गुणवत्ता के साथ कृषि कार्य किया जा सकता है ।

  1. बुवाई हेतु सीड ड्रिल, फर्टीसीड ड्रिल का प्रयोग बीज एवं उर्वरक दोनों की उपयोग क्षमता को बढ़ाता है।
  2. जीरो टिलेज सीड ड्रिल के माध्यम से विलंब के दशा में धान की खेत में बगैर खेत के अतिरिक्त तैयारी किए बुवाई किया जा सकता है इससे ना केवल खेत की तैयारी पर होने वाले व्यय की बचत होती है बल्कि समय से बुवाई के कारण उत्पादन पर भी कीट-रोग प्रभाव नहीं पड़ता है।
  3. रोटावेटर की सहायता से खेत की जुताई-बुवाई के लिए तैयारी सुगमता से कम समय में पूर्ण किया जा सकता है।
  4.  स्प्रिंकलर, ड्रिप इरीगेशन बुवाई वाले क्षेत्रों में इसका प्रयोग किया जा सकता है इससे जल की बचत होती है अधिक मात्रा में फसलों की सिंचाई किया जा सकता है, ड्रिप इरिगेशन मेथड से लगभग 70 से 75% सिंचाई की बचत एवं इसके साथ उर्वरक प्रयोग से पैदावार लागत श्रम में कम किया जा सकता है।

फसल बीमा:

  • भारत में कृषि प्राकृतिक आपदाओं जैसे सूखा, बाढ़ आदि से प्रभावित होती है जिससे किसानों की फसल पर काफी असर होता है। कृषि-बीमा  प्राकृतिक कारणों से होने वाले कृषि नुकसान की भरपाई फसल बीमा द्वारा कर सकते है।
  • फसल बीमा होने के कारण किसान फसलों की नईं किस्म और नई कृषि तकनीकों को भी प्रयोग में ला सकते है, क्योंकि यह जोखिम, बीमा द्वारा रक्षित होता है।
  • कृषि भूमि और फसल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए उत्पादन की लागत को कम करने के लिए सुधार कृषि प्रथाओं का उपयोग करें, और सरकार द्वारा समर्थन मूल्य को ध्यान में रखें। इसके अलावा किसान विभिन्न कृषि कार्यक्रमों में भागीदारी बढ़ाएं जिससे उन्हें नवीनतम कृषि तकनीक  की जानकारी हो ।
  • इस प्रयोजन के लिए भारत सरकार ने देश भर में कई कृषि योजनाओं की शुरुआत की है, फसल बीमा योजना, कृषि आय बीमा योजना, राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना आदि।

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